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किलर कफ सीरप: कई सैम्पल टेस्ट में फेल, दवाओं की गुणवत्ता पर उठ रहे कई सवाल; समझें पूरा नंबर गेम

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发表于 2025-10-28 09:25:57 | 显示全部楼层 |阅读模式
  



जागरण टीम, नई दिल्‍ली। बीमार के लिए दवा ही आखिरी उम्मीद होती है, लेकिन वही बीमार या जानलेवा हो तो इससे बड़ी विडंबना और कुछ नहीं हो सकती। देश में सीरप पीने से बच्चों की मौत के मामलों ने एक भयावह सच्चाई को उजागर किया है। दवाओं की गुणवत्ता सुनिश्चित करने के लिए जिम्मेदार नियामक तंत्र अक्षम और नकारा है। भारतीय दवा कंपनियों के सीरप से दुनिया के दूसरे हिस्सों में भी मौत के मामले सामने आ चुके हैं। विज्ञापन हटाएं सिर्फ खबर पढ़ें

इसके बावजूद किसी भी स्तर पर सुधार की पहल नहीं हुई। राज्यों में दवाओं की टेस्टिंग के लिए लैब नहीं हैं। न ही स्टेट ड्रग कंट्रोलर के पास जरूरी मैन पावर है। बाजारों में ऐसी दवाएं भी धड़ल्ले से बिक रही हैं, जिनके नमूने टेस्ट में फेल पाए गए हैं। जाहिर है ऐसा होना दवा कंपनियों और नियामक के बीच भ्रष्ट गठजोड़ के बिना संभव नहीं है। सवाल है कि सीरप से हुई मौतों के लिए कौन जिम्मेदार है? इसी सवाल पर केंद्रित है आज का मुद्दा...
मौत की घटनाएं और कड़े उपायों का वादा

देश में जब भी दवाओं से मौत की घटना होती है तो हर बार नियामक संस्थाएं कड़े सुरक्षा उपाय लागू करने का वादा करती हैं। लेकिन हर बार मौत के नए मामले हमारे सामने वहीं सवाल रखते हैं। भारत की दवाएं कितनी सुरक्षित हैं और क्यों एक ही तरह की चूक बार बार क्यों हो रही है?
दांव पर साख

भारत सिर्फ दवाएं नहीं बनाता है। दुनिया का 20 प्रतिशत प्रिस्क्रिप्शन भारतीय दवाओं से पूरा होता है। भारत विश्व को सबसे ज्यादा जेनरिक दवाओं की आपूर्ति करता है। ऐसे में अगर दवाओं की गुणवत्ता और लोगों की सुरक्षा सुनिश्चित करने के लिए ठोस कदम नहीं उठाए गए तो इससे दुनिया भर में भारतीय दवाओं की मांग कम हो सकती है और देश को आर्थिक मोर्चे पर नुकसान उठाना पड़ सकता है।



  • 20% वैश्विक जेनरिक दवाओं की आपूर्ति करता है भारत।
  • 40% मांग अमेरिका में जेनरिक दवाओं की पूरी करता है।
  • 60% वैश्विक वैक्सीन आपूर्ति भारत से होती है।
  • 25% ब्रिटेन की दवाओं की मांग पूरी करता है।
  • 50% हिस्सेदारी है अफ्रीका में जेनरिक दवाओं के आयात में।


सिस्टम में कमियां उजागर करते हैं दवाओं के बारे में अलर्ट


केंद्रीय औषधि मानक नियंत्रण संगठन हर महीने ड्रग अलर्ट प्रकाशित करता है, जिसमें दर्द निवारक और एंटीबायोटिक दवाओं से लेकर कफ सीरप तक, गुणवत्ता परीक्षण में विफल रहने वाली दवाओं की सूची होती है। अगस्त के नवीनतम अलर्ट में, 94 उत्पादों को ‘मानक गुणवत्ता के नहीं’ के रूप में चिह्नित किया गया था। और पिछले एक साल में ऐसे अलर्ट में तेजी से वृद्धि हुई है।

2024 में 877 अमानक दवाओं की संख्या 2025 के पहले आठ महीनों में बढ़ कर 1,184 हो गई हैं। इसके अलावा, मार्च 2024 और अगस्त 2025 के बीच, बारह कफ सीरप अमानक पाए गए, जो भारत और विदेशों में सीरप से पीने बच्चों की मौतों के मामलों के मद्देनजर एक चिंताजनक आंकड़ा है। जून की राज्य एनएसक्यू रिपोर्ट से पता चलता है कि कई राज्यों ने आंकड़े प्रस्तुत नहीं किए हैं। सवाल उठता है कि कितनी असुरक्षित दवाएं पकड़ में नहीं आ पाती हैं।



  • वित्त वर्ष 2024 में 35.3 अरब डॉलर पहुंच गया फार्मा निर्यात।
  • 8.7 अरब डॉलर पार कर गया सिर्फ अमेरिका को निर्यात।
  • 50% अमेरिकी प्रेस्क्रिप्‍शन को भारतीय जेनेरिक दवाओं ने पूरा किया।
  • 750 से अधिक यूएस एफडीए से मंजूरी पा चुके फार्मास्युटिकल प्‍लांट हैं भारत में, अमेरिका के बाहर सबसे अधिक है यह संख्‍या।
  • 10,500 से अधिक सक्रिय मैन्‍युफैक्‍चरिंग यूनिट और 3000 से अधिक फार्मा कंपनियां  भारत में हैं।
  • 8 डब्‍ल्‍यूएचओ-प्री क्‍वालीफाइड वैक्‍सीन मैन्‍यूफैक्‍चरर और 600 से अधिक फार्मुलेशन प्‍लांट हैं एमएसई सेक्टर में।  
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